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पर्यावरण का मुखौटा, बीएमसी के फैसलों की अव्यवस्था… ठाकरे दौर के कुप्रबंधन ने ‘बेस्ट’ को पटरी से उतार दिया!

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मुंबई की ‘बेस्ट’ सिर्फ बस सेवा नहीं, बल्कि शहर की जीवनरेखा है। मज़दूर, छात्र, बुज़ुर्ग, महिलाएँ, झुग्गी-बस्ती के निवासी और कॉर्पोरेट कर्मचारी—सबका रोज़ का सफ़र बेस्ट पर टिका है। कभी एशिया की सबसे अनुशासित और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था मानी जाने वाली बेस्ट आज आर्थिक तंगी, प्रशासनिक उलझन और नीतिगत भ्रम का प्रतीक बन चुकी है। यह हालात अचानक नहीं बने—आरोप है कि बीएमसी पर लगभग 25 साल एक ही परिवार के शासन में लिए गए गलत फैसलों और लगातार उपेक्षा का नतीजा हैं। पर्यावरण की बातें, काम में विरोधाभास आदित्य और उद्धव ठाकरे खुद को पर्यावरण का रक्षक बताते रहे—आरे कारशेड, क्लाइमेट एक्शन प्लान, प्रदूषण विरोधी भाषण—शब्द बड़े थे। लेकिन ज़मीनी काम में इन्हीं हरित नीतियों को नज़रअंदाज़ किया गया। केंद्र सरकार की फेम-2 योजना के तहत मुंबई को इलेक्ट्रिक बसों के लिए 150 करोड़ रुपये का अनुदान मिला था। मकसद साफ़ था—प्रदूषण कम करना, ईंधन खर्च घटाना और सार्वजनिक परिवहन को आधुनिक बनाना। मगर इस मौके को पकड़ने के बजाय फैसले टलते रहे, टेंडर रद्द हुए और परियोजनाएँ अधर में लटकती रहीं। सीएनजी ढांचे का खुला अपव्यय ठाकरे कार्यकाल में बेस्ट के लिए सीएनजी ढांचा खड़ा करने पर करोड़ों खर्च हुए। महानगर गैस के सहयोग से 15 डिपो में ऐसी व्यवस्था बनी कि रोज़ करीब 4,000 बसों को ईंधन मिल सके। हकीकत यह है कि आज बेस्ट के पास सिर्फ़ लगभग 1,200 सीएनजी बसें हैं। यानी करीब70% क्षमता बेकार पड़ी है—यह सिर्फ़ खराब योजना नहीं, करदाताओं के पैसे की बर्बादी का आरोप है। बसों का बेड़ा बढ़ा नहीं, घटता चला गया 2017 से 2022 के बीच—जब राज्य और बीएमसी में ठाकरे परिवार का दबदबा था—बेस्ट की बसें 4,500 से घटकर 3,000 से नीचे आ गईं। बढ़ती आबादी वाले शहर में बसें बढ़नी चाहिए थीं, उल्टा क्यों घटीं? बस खरीद की फाइलें सालों क्यों अटकी रहीं? जवाब आज तक नहीं। समन्वय का संकट सीएनजी ढांचा बनाने वाली गैस कंपनी और बस चलाने वाली बेस्ट—दोनों के बीच नीति स्तर पर तालमेल नहीं दिखा। अचानक 100% इलेक्ट्रिक नीति का ऐलान हुआ, लेकिन पहले से बने सीएनजी नेटवर्क का क्या होगा—यह साफ़ नहीं किया गया। नतीजा: सुरक्षित, आज़माई हुई और अपेक्षाकृत सस्ती सीएनजी तकनीक को किनारे कर दिया गया और तैयार ढांचा बेकार हो गया। इलेक्ट्रिक बसों का विरोध—क्यों? इलेक्ट्रिक बसें पर्यावरण-अनुकूल मानी जाती हैं, फिर उनका विरोध क्यों? खास बात यह कि बेस्ट खुद बिजली वितरण भी करती है। अगर डिपो में चार्जिंग स्टेशन लगाकर अपनी ही बिजली का उपयोग होता, तो ईंधन खर्च काफ़ी घटता, ऑपरेटिंग लागत कम होती और किराया बढ़ाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। यह सीधा गणित क्यों नज़रअंदाज़ हुआ—सवाल कायम है। ‘5% कमीशन’ का साया विपक्ष का आरोप रहा कि ठाकरे दौर में बिना ‘5% कमीशन’ के काम नहीं होते। बस खरीद में देरी, टेंडरों की गड़बड़ी, बार-बार रद्दीकरण—इन सबने शक को और मज़बूत किया। सही समय पर फैसले न लेने से बेस्ट आर्थिक दलदल में फँसी और मुंबईकरों को जर्जर बसों में सफ़र करना पड़ा। नागपुर-पुणे से सीख क्यों नहीं? नागपुर ने केंद्र के साथ मिलकर ग्रीन बस परियोजना में बढ़त ली। पुणे के पास आज 600 से ज़्यादा इलेक्ट्रिक बसें हैं। वहाँ परियोजनाएँ ‘कमीशन राजनीति’ में नहीं फँसीं। फिर मुंबई में ही ऐसा क्यों हुआ—इसका जवाब 25 साल सत्ता में रहे बीएमसी के शासकों को देना होगा। तकनीकी सीमाएँ और नीति की चूक इलेक्ट्रिक बसें ग्रीन हैं, लेकिन सीमाएँ भी हैं—एक चार्ज में पूरे दिन की सेवा, चार्जिंग समय, आयातित बैटरियों पर निर्भरता। ऐसे में सीएनजी और इलेक्ट्रिक का संतुलन ज़रूरी था। ठाकरे दौर में यह संतुलन नहीं बन पाया। बेस्ट गिरी—ज़िम्मेदार कौन? आरोप साफ़ है—पर्यावरण बचाने की बात हुई, पर कमीशन आड़े आ गए। फैसलों की अव्यवस्था और ग्रीन मुखौटे ने शहर की जीवनरेखा को कमज़ोर किया। मुंबईकर अब जागरूक हैं। सार्वजनिक परिवहन को ठप कर, भ्रम फैलाकर शहर को नुकसान पहुँचाया गया, तो इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी—क्योंकि बीएमसी किसी एक परिवार की जागीर नहीं है। BMC is not a family business #notafamilybusiness

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