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मुंबई STP परियोजना: 20 वर्षों की देरी, 26 हज़ार करोड़ का खर्च और BMC की निर्णयहीनता की कीमत!

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मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) को देश की सबसे समृद्ध स्थानीय स्वशासन संस्था के रूप में जाना जाता है। लेकिन पिछले 25 वर्षों से अधिक समय तक बीएमसी पर एक ही परिवार का वर्चस्व रहने के कारण, इस संस्था का उपयोग जनसेवा की बजाय सत्ता के केंद्र के रूप में किया गया—ऐसा गंभीर आरोप बार-बार लगाया जाता रहा है। इसी सत्ता-केंद्रित राजनीति का परिणाम यह है कि मुंबई जैसे वैश्विक स्तर के शहर को आज भी बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं के लिए पूरे दो दशकों तक इंतज़ार करना पड़ा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) परियोजनाओं में 20 वर्षों की देरी इसका सबसे स्पष्ट और चौंकाने वाला उदाहरण है। 2002 से अटका हुआ प्रोजेक्ट मुंबई में एसटीपी परियोजना की अवधारणा पहली बार वर्ष 2002 में प्रस्तुत की गई थी। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ती जलापूर्ति और उससे उत्पन्न होने वाले सीवेज के वैज्ञानिक उपचार की आवश्यकता उस समय ही स्पष्ट हो चुकी थी। हालाँकि, अवधारणा प्रस्तुत किए जाने के बावजूद इसका वास्तविक क्रियान्वयन नहीं हुआ। 2009 में परियोजना का पुनर्गठन किया गया, लेकिन वह भी काग़ज़ों तक ही सीमित रहा। आगे के कई वर्षों तक निर्णय न लेने के कारण मुंबईकरों को इसकी कीमत पर्यावरणीय प्रदूषण के रूप में चुकानी पड़ी। 26 हजार करोड़ रुपये की महत्त्वाकांक्षी परियोजना अब अंततः ‘मुंबई सीवेज डिस्पोज़ल प्रोजेक्ट–II’ के अंतर्गत वरली, बांद्रा, धारावी, वर्सोवा, मालाड, घाटकोपर और भांडुप में सात अत्याधुनिक एसटीपी परियोजनाएँ स्थापित की जा रही हैं। इन सातों परियोजनाओं की संयुक्त क्षमता प्रतिदिन 2464 मिलियन लीटर सीवेज के उपचार की होगी। बीएमसी ने स्पष्ट किया है कि इस परियोजना की कुल लागत 26 हजार करोड़ रुपये से अधिक है। इन परियोजनाओं का भूमिपूजन भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुआ, लेकिन यह समारोह उत्सव से अधिक, दो दशकों की देरी का हिसाब माँगने वाला प्रतीत होता है—क्योंकि बीएमसी पर 25 वर्षों तक ठाकरे परिवार का शासन रहा। इस पारिवारिक सत्ता ने मुंबईकरों को विकास नहीं, बल्कि केवल विलंब ही दिया। टेंडर रद्द, महंगे प्रस्ताव और मनमानी इस परियोजना में हुई देरी के पीछे केवल तकनीकी समस्याएँ ही नहीं थीं। 2017 में पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना के कारण टेंडर प्रक्रिया न्यायालय में फँस गई। मामला एनजीटी और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने बीएमसी को राहत दी, लेकिन सत्ता में होने के बावजूद उसके बाद भी काम को गति नहीं मिली। इसी दौरान महंगे और फुलाए हुए टेंडर, बोलीदाताओं की कमी और लागत में वृद्धि के कारण कई टेंडर रद्द किए गए। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि बीएमसी पर एक परिवार का वर्चस्व था और उसी के संरक्षण में अव्यवस्थित प्रशासन चलता रहा। 2021 में तत्कालीन विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस ने एसटीपी परियोजनाओं के टेंडरों को “अवास्तविक और फुलाए हुए” बताते हुए उन्हें रद्द करने की माँग की थी। इससे टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर ही गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया। परिणाम: प्रदूषण में डूबी हुई मुंबई आज भी मुंबई में सीवेज को केवल प्राथमिक स्तर पर उपचारित कर सीधे समुद्र, नदियों और खाड़ियों में छोड़ा जा रहा है। मिठी नदी, ओशिवरा, दहिसर और पोईसर जैसी नदियाँ अब नदियाँ नहीं रहीं, बल्कि गंदे पानी की नालियाँ बन चुकी हैं। इस देरी का सीधा प्रभाव समुद्री और खाड़ी क्षेत्रों की जैव विविधता पर, मुंबई के पीने के पानी पर और सबसे महत्वपूर्ण—मुंबईकरों के स्वास्थ्य पर पड़ा है। जलजनित रोग, दुर्गंध, प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण—ये सभी निर्णयहीनता की कीमत के रूप में मुंबईकर चुका रहे हैं। दो दशकों की सत्ता, फिर भी बुनियादी सवाल अधूरे यदि किसी शहर की सबसे बुनियादी पर्यावरणीय परियोजना लगातार दो दशकों तक अटकी रहती है, जबकि सत्ता एक ही परिवार के हाथों में रही हो, तो उस सत्ता की जिम्मेदारी तय होना स्वाभाविक है। यदि एसटीपी परियोजनाएँ समय पर पूरी हुई होतीं, तो आज मुंबई का पर्यावरणीय परिदृश्य बिल्कुल अलग होता। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, सीवेज को उपचारित कर पुनः उपयोग योग्य बनाना अनिवार्य था—जैसा सिंगापुर जैसे शहरों ने सफलतापूर्वक किया है। लेकिन मुंबई में आज भी पुराने तकनीकी समाधानों पर ही निर्भरता रही—यह भी इस विलंब की असफलता का प्रमाण है। यदि बीएमसी पर शासन करने वाले परिवार में राजनीतिक इच्छाशक्ति होती, तो यह परियोजना 20 वर्ष पहले ही पूरी हो चुकी होती। मुंबईकरों का अंतिम सवाल आज एसटीपी परियोजना का आरंभ होना आवश्यक है और इसका स्वागत भी किया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही, 20 वर्षों की देरी, 26 हजार करोड़ रुपये तक पहुँचा खर्च और प्रदूषण से हुआ नुकसान—इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। मुंबईकरों ने दो दशकों तक सहन किया। उन्होंने प्रदूषण सहा, स्वास्थ्य जोखिम सहे और विकास को रुकते हुए देखा। लेकिन याद रखिए— अब मुंबईकर और सहन नहीं करेंगे, क्योंकि बीएमसी किसी एक परिवार की जागीर नहीं है। BMC is not a family business #notafamilybusiness

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