पहचान की बासी खिचड़ी का 'कॉम्बो मील…'
Articlesदोपहर का समय था… होटल में तरह-तरह के व्यंजनों की खुशबू फैली हुई थी। ग्राहकों की भीड़ उमड़ रही थी। तभी एक न्यूज़ चैनल की ‘ओवर-एक्साइटेड’ एंकर, हाथ में बड़ा-सा बूम माइक और पीछे हांफते हुए कैमरामैन के साथ होटल में घुस गई। एंकर: मुंबई का खान-पान प्रेमी बहुत ही चुनींदा होता है। उसे यह पूरी जानकारी होती है कि गरमागरम मिसल कब खानी चाहिए, किसके यहाँ खानी चाहिए, और झणझणीत वडापाव किस इलाके में सबसे अच्छा मिलता है। आजकल मुंबई महानगरपालिका के चुनाव के बहाने ठाकरे भाइयों के एक साथ आने के जो संकेत मिल रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है कि मुंबई की राजनीतिक रसोई में कोई अजीब-सी ‘फ्यूज़न डिश’ तैयार की जा रही है। जिन दो भाइयों ने सालों तक एक-दूसरे की रेसिपी को ‘फीका’ कहा, वही अब साथ आकर मुंबईकरों को ‘झणझणीत मराठी थाली’ परोसने निकल पड़े हैं। लेकिन इस डिश की खुशबू कुछ ज़्यादा ही ‘स्वार्थी’ लग रही है। “नमस्कार! मुंबई महानगरपालिका का बिगुल बज चुका है, और ठाकरे भाइयों की युति की चर्चा अब घरों से निकलकर सीधे होटल की टेबल तक पहुँच चुकी है। आइए जानते हैं, इस ‘महामिलन’ युति के बारे में मुंबई के खान-पान प्रेमियों की क्या राय है!” एंकर तेज़ी से एक कोने में बैठे एक बुज़ुर्ग काका के पास पहुँची, जो शांति से पिठला-भाकरी खा रहे थे। एंकर: “काका, ठाकरे भाई एक साथ आ रहे हैं, सीटों के बँटवारे की बातें चल रही हैं। आपको क्या लगता है, क्या इस युति से मुंबई का चेहरा बदलेगा?” काका: (निवाला निगलते हुए मुस्कुराकर) “बेटी, होटल का नियम यही है—मालिक बदल जाए, पर स्वाद वही रहना चाहिए। यहाँ तो पुराने मालिक ने ही मुंबई का स्वाद पूरी तरह बिगाड़ दिया है। अब होटल नहीं चल रहा, इसलिए उसने एक और पार्टनर जोड़ लिया है। मतलब बस इतना कि दो पुराने शेफ मिलकर नई ‘फ्यूज़न’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले 30 साल से इस ‘खानावली’ की चाबी इन्हीं के पास थी। तब मुंबईकरों को क्या मिला? गड्ढों की चटनी और गंदे पानी की ग्रेवी!” एंकर थोड़ी असहज हुई और तुरंत दूसरे टेबल की ओर बढ़ी, जहाँ एक तगड़ा-सा, खुशमिज़ाज सज्जन मिसल पर टूट पड़े थे। एंकर: “दादा, आपको इन दो भाइयों की युति के बारे में क्या लगता है?” दादा: “अब ये दोनों ब्रांड्स ‘ओवररेटेड’ लगने लगे हैं। एक समय था जब इनके भाषणों की तड़का सुनने मुंबई उमड़ती थी। अब वही पुराना मेनू बचा है। एक तरफ सत्ता का मलाई खत्म हो चुका ‘बड़ा मालिक’, और दूसरी तरफ नए ग्राहक न मिलने से बंद पड़ा ‘छोटा मालिक’। ये दोनों शेफ जब साथ आने की बात करते हैं, तो मुंबई को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि अपनी पुरानी ‘जागीर’ बचाने के लिए आते हैं। ग्राहक—यानी मुंबईकर—अब पुराने स्वाद से ऊब चुका है। उसे विकास का नया तड़का चाहिए।” एंकर तीसरे टेबल पर बैठी एक मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा महिला के पास पहुँची। नौकरीपेशा महिला: “मुंबई महानगरपालिका इन दोनों भाइयों के लिए एशिया का सबसे बड़ा ‘अन्नछत्र’ है। दशकों तक इसकी ‘कन्फेक्शनरी’ एक ही परिवार के पास रही। मलाई किसे देनी है, बिरयानी किसे बाँटनी है—सब फैसले एक ही रसोई में होते रहे। आज जब तिजोरी की चाबी हाथ से निकलने का डर लगा है, तब भाई-भाई का प्यार उमड़ पड़ा। यह विकास नहीं है, बल्कि ‘होटल का गल्ला’ फिर से अपने कब्ज़े में लाने की साज़िश है।” एंकर को एक भी सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो वह एक बुज़ुर्ग दादाजी के पास पहुँची। दादाजी: “राजनीति के इस होटल में जब भी मंदी आती है, तब ‘मराठी अस्मिता’ का बासी मसाला निकाला जाता है। जिन भाइयों ने मुंबई की सड़कों के गड्ढों और बारिश के पानी पर कभी कोई ठोस समाधान नहीं दिया, वही अब फिर से ‘मराठी माणूस को जगाने’ की पुड़िया बेच रहे हैं। लेकिन मुंबई का खवैय्या अब समझदार हो गया है। उसे पता है कि यह युति प्यार की मिठाई नहीं, बल्कि सत्ता की भजिया तलने के लिए जलाई गई चूल्हा है।” घबराई हुई एंकर अब एक उच्च-शिक्षित परिवार के पास पहुँची। महिला: “यह मर्जर ‘कॉरपोरेट कैटरिंग’ बनाम ‘फैमिली डायनिंग’ जैसा है। एक तरफ मुंबई को वैश्विक शहर बनाने के लिए नए प्रोजेक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की बात हो रही है, और दूसरी तरफ ठाकरे भाई अब भी ‘हमारी पुरानी चव ही सबसे अच्छी’ के भ्रम में हैं। यह दो डूबते रेस्टोरेंट्स का मिलकर निकाली गई नई फ्रेंचाइज़ी जैसा लगता है—जिसमें न नया विज़न है, न नई डिश। सिर्फ वही पुरानी शिकायतें और ‘हम ही मुंबई के मालिक हैं’ वाला अहंकार।” आख़िरकार एंकर होटल के मालिक तात्या के पास पहुँची। एंकर: “तात्या, आप इतने सालों से होटल चला रहे हैं। क्या इस युति से राजनीति की उनकी मंदी खत्म होगी?” तात्या: (चश्मा ठीक करते हुए) “बेटी, जब होटल का धंधा गिरता है, तो मालिक ‘बाय वन गेट वन फ्री’ स्कीम निकालता है। यह युति भी वैसी ही स्कीम है। एक भाई का इंजन दम तोड़ रहा है और दूसरा अपना धनुष-बाण संभाल नहीं पाया। अब दोनों मिलकर ‘कॉम्बो मील’ बेचने निकले हैं। लेकिन ग्राहक अब समझदार है। वह जानता है कि ये दोनों मुंबई की रसोई सुधारने नहीं, बल्कि अपनी तिजोरी भरने के लिए साथ आए हैं। पर मुंबईकरों को एक बात समझनी चाहिए—आख़िर में सवाल बिल का होता है। क्या इस युति का राजनीतिक बिल एक बार फिर मुंबईकरों को ही भरना पड़ेगा?” BMC is not a family business #notafamilybusiness
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