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मुंबई की ‘‘पिगी बैंक’’ और दो भाइयों की ‘‘बीमा पॉलिसी’’!
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मुंबई की ‘‘पिगी बैंक’’ और दो भाइयों की ‘‘बीमा पॉलिसी’’!

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सुबह का समय रम्या के लिए हमेशा भागदौड़ भरा होता है, लेकिन आज उसके घर में एक अलग ही “बजट” की चर्चा चल रही थी। मौका था बेटे का जन्मदिन और मेज़ पर रखी उसकी छोटी-सी गुलाबी पिगी बैंक। पिछले दो वर्षों से रम्या का बेटा उसमें बड़ी उम्मीद से सिक्के डाल रहा था। कभी मेहमानों द्वारा दी गई छुट्टे पैसे, तो कभी नाश्ते के बचे हुए पैसे। आज बच्चे ने वह बैंक हाथ में ली और मासूमियत से पूछा, “बाबा, आज जन्मदिन है ना… आज तोड़ें क्या?” रम्या ने मुस्कराते हुए बच्चे के सिर पर हाथ रखा, लेकिन उस गुलाबी पिगी बैंक को देखते हुए उसे अचानक मुंबई महानगरपालिका की उस विशाल इमारत का आभास हुआ। उसे बार-बार यह महसूस हो रहा था कि हम साधारण मुंबईकर उस पिगी बैंक में पड़ा एक बेचारापन भरा “सिक्का” हैं। हमारा काम सिर्फ टैक्स और वोट के रूप में अंदर गिरते समय “खन-खन” की आवाज़ करना और उस बैंक के पेट की खाली जगह भरना है। उस पिगी बैंक को तोड़कर उसमें से मलाई आखिर कौन खाएगा, यह वह “सिक्का” कभी तय नहीं कर सकता। पिगी बैंक बाहर से आने वाले सिक्कों से भरती है, लेकिन जब वह टूटती है, तब दिवाली मालिक की होती है। पिछले कई वर्षों से इस “मुंबई नाम की पिगी बैंक” को भरने का काम आम आदमी कर रहा है, लेकिन उसके हिस्से में आज भी सड़कें मिलती हैं या गड्ढे, और पानी मिलता है या गंदला पानी—ये सवाल हमेशा के लिए बने हुए हैं। रम्या सोचने लगा—इन दिनों जो दो भाइयों के एक साथ आने का माहौल बना है, वह सच में कोई गठबंधन है या अपने ही राजनीतिक अस्तित्व पर चढ़ाया गया एक “बीमा” (Insurance)? जब उद्धव ठाकरे की सत्ता संकट में थी, तब राज ठाकरे दूर से ताने मार रहे थे, और जब राज ठाकरे का इंजन पटरी से उतर गया था, तब उद्धव ठाकरे मुस्कराकर देख रहे थे। लेकिन आज दोनों भाइयों को समझ आ गया है कि अगर भाजपा महायुति के “विकास मॉडल” को हराना है, तो एक बार फिर वही पुरानी “भावनात्मक चाल” चलनी पड़ेगी। जिन लोगों ने अपने घर भरने के लिए मुंबई की प्रगति को दस साल पीछे धकेल दिया, वे अब मुंबई को क्या न्याय देंगे? यह सवाल रम्या को बेचैन कर रहा था। जब ये दोनों भाई एक-दूसरे पर टूट पड़े थे, तब उन्हें न मराठी आदमी की याद आई थी, न अस्मिता की। लेकिन अब जब किसी तीसरे के हाथ में इस महानगरपालिका की तिजोरी की “चाबी” जाने के संकेत दिखाई देने लगे हैं, तब भाइयों को भाईचारे की याद आने लगी है। यह गठबंधन “स्वार्थ के लिए” हुआ है—यह बताने के लिए किसी राजनीतिक विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं है। यह गठबंधन एक साफ संदेश है— “मेरी पिगी बैंक मुझे वापस चाहिए, इसके लिए चाहे किसी से भी हाथ मिलाना पड़े।” जब रम्या घर से बाहर निकला, सामने वही बोर्ड था— “मराठी आदमी जागो… यह तुम्हारे अस्तित्व की आख़िरी लड़ाई है।” उसे पढ़कर रम्या को हँसी आ गई। उसे लगा—अगर सामने की दीवार पर ऐसा कोई काल्पनिक बैनर होता कि, “मुंबईकरों, हमारा फैमिली बिज़नेस फिलहाल घाटे में है, कृपया हमें वोट देकर एक बार फिर हमारी जागीरदारी स्थापित करने में मदद करें!” तो कितना ईमानदार लगता। या उससे भी साफ शब्दों में वहाँ यह लिखा होना चाहिए था— “मुंबईकरों, यह हमारी ‘पिगी बैंक’ की आख़िरी लड़ाई है, कृपया सिक्के डालना न भूलें!” क्योंकि यह लड़ाई आम लोगों के अस्तित्व की नहीं है। यह लड़ाई उस “चाबी” के लिए है— क्योंकि जिसके हाथ में चाबी, उसी के हाथ में मुंबई! रम्या घर लौटा। बेटा अब भी उस पिगी बैंक को उम्मीद से देख रहा था। रम्या ने उसके कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बुदबुदाया— “बेटा, इस बैंक को तोड़ने से पहले बस एक बात जाँच लेना… यह सच है कि तूने इस बैंक को अपने परिश्रम से भरा है, लेकिन इसे तोड़ने के बाद जो खुशी होगी, वह तुझे मिलेगी या तेरे नाम पर किसी और की शानदार पार्टी होगी?” शायद बच्चे को उसका उत्तर नहीं मिला होगा, लेकिन अब मुंबईकरों के लिए खुद से यह सवाल पूछने का समय निश्चित रूप से आ गया है। BMC is not a family business #notafamilybusiness

मुंबई की ‘‘पिगी बैंक’’ और दो भाइयों की ‘‘बीमा पॉलिसी’’!

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