हम दो, हमारे दो… परफेक्ट फैमिली!
Articlesबाल्या पाँचवी कक्षा में पढ़ता था। स्कूल से आदेश आया था कि अगले दिन “आर्ट एंड क्राफ्ट” के पीरियड में एक कोलाज बनाकर लाना है। शर्त सिर्फ़ एक थी— “विषय करंट होना चाहिए और उसमें पुराने-नए का संगम दिखना चाहिए!” घर पहुँचते ही बाल्या चिल्लाया, “बाबा, कोलाज क्या होता है?” उसके बाबा—यानी गबाळ्या—उस समय उबले हुए आलू छीलने में व्यस्त थे। गबाळ्या का विचारों से वैसे भी दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। गली के नगरसेवक साहब की मेहरबानी से गबाळ्या के पिता ने कभी वड़ापाव की गाड़ी लगाई थी। पिता के जाने के बाद गबाळ्या ने उस गाड़ी की “विरासत” बड़े गर्व से संभाल ली थी। गबाळ्या की चॉल के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे टावर खड़े हो चुके थे। टावरों में रहने वाले लोग उसे व्हाट्सऐप पर ऑर्डर देते थे और वही नगरसेवक साहब आते-जाते उसके वड़ापाव की तारीफ़ करते रहते थे। हर रविवार गबाळ्या बीस वड़ापाव मुफ़्त में लेकर नगरसेवक के पास जाता और पूछता, “साहब, चॉल का रिडेवलपमेंट कब होगा?” साहब उसके कंधे पर हाथ रखकर कहते, “गबाळ्या, पहले चुनाव होने दे। सबसे पहले तुम्हारी ही चॉल गिरवाऊँगा। मराठी आदमी को मुंबई में टिकना चाहिए—(चॉल में ही क्यों न हो!)” गबाळ्या की पत्नी ताने मारती, “साहब के पेट में जितने वड़ापाव मुफ़्त में गए, उतने में विरार में अपना घर आ गया होता!” लेकिन गबाळ्या अपने “ब्रांड” पर अडिग था। “अस्मिता ज़रूरी है, घर नहीं!” वह पत्नी पर भड़क उठा, “आज विरार की बात कर रही है, कल डहाणू कहेगी, परसों गुजरात भेजेगी! मराठी आदमी को मुंबई में ही टिकना चाहिए!” उसी बीच बाल्या ने फिर पूछा, “बाबा, कोलाज कैसे बनाऊँ?” गबाळ्या ने व्हाट्सऐप सेना के ग्रुप में पूछ लिया कि कोलाज कैसे बनाते हैं। तुरंत जवाब आए—कैंची लो, गोंद लो, पुराने-नए फोटो काटो और चिपका दो! गबाळ्या के पास रद्दी का ढेर था। उसने हाथ धोए और बाल्या के साथ कोलाज बनाने बैठ गया। गबाळ्या ने रद्दी से पहला फोटो निकाला—अपने “इकलौते साहब” के सुपुत्र का। उसे साहब के शब्द याद आए, “मेरे बाद मेरे बेटे का ख़याल रखना।” गबाळ्या ने अपने बेटे से ज़्यादा साहब के बेटे का ख़याल रखा था। उसने वह फोटो बड़े सम्मान से बीचों-बीच चिपका दिया। फिर बगल में साहब के पोते का फोटो लगा दिया। बाल्या बोला, “बाबा, टीचर ने कहा था विषय करंट होना चाहिए, ये तो बहुत ओल्ड-एज लग रहा है!” “चुप रह, बाल्या! ये हमारा युवा नेता है।” लेकिन बाल्या बोला, “ये ट्रेंडी नहीं लग रहा।” गबाळ्या को आइडिया सूझी। “अरे, अभी चुनाव चल रहे हैं ना? इन फोटोज़ के एक तरफ़ मुंबई महानगरपालिका (BMC) का फोटो चिपकाते हैं!” उसने बीएमसी का फोटो चिपकाया। फिर लगा कुछ कमी रह गई है। “परफेक्ट फैमिली” अभी पूरी नहीं हुई थी। उसने दूसरी तरफ़ साहब के भतीजे और भतीजे के बेटे का फोटो भी चिपका दिया। एक ही काग़ज़ पर गबाळ्या ने अपनी परंपरा भी रखी और साहब की परंपरा भी। एक ही वंश की दो शाखाएँ अब महानगरपालिका से सटी बैठी थीं। बाल्या ने पूछा, “बाबा, लेकिन पुराने-नए का संगम कहाँ है?” गबाळ्या मचान पर चढ़कर अपने पिता के ज़माने की और पुरानी रद्दी ढूँढने लगा। तभी बाल्या ने खुद एक पुराने अख़बार से एक विज्ञापन काटा और कोलाज के बिल्कुल ऊपर हेडलाइन की तरह चिपका दिया। बाल्या खुशी से चिल्लाया, “बाबा, हो गया मेरा कोलाज!” गबाळ्या ने चश्मा ठीक किया और कोलाज देखा। उसका आलू छीलता हाथ सीधा माथे पर जा लगा। बीचों-बीच, सारे फोटोज़ के ऊपर, बाल्या ने एक पुराना विज्ञापन चिपकाया था— “हम दो, हमारे दो!” बीएमसी के इर्द-गिर्द यह “परफेक्ट फैमिली” देखकर गबाळ्या के पसीने छूट गए। बाल्या ने एक ही नारे में साहबों की खानदानी राजनीति को बिल्कुल सटीक पकड़ लिया था। अगले दिन स्कूल में टीचर ने बाल्या का कोलाज देखा और हँसते हुए माथा पकड़ लिया। उन्होंने कहा, “बाल्या, इसमें कुछ भी ‘नया’ नहीं है! मुंबई में पिछले तीस साल से यही चल रहा है—‘हम दो, हमारे दो’ और हमारी ही परफेक्ट फैमिली! मुंबई के विकास का कोलाज इन्हें आज तक बनाना नहीं आया, बस फैमिली फोटो चिपकाते रहे हैं। ये तो घराणेशाही का पारंपरिक कोलाज है!” BMC is not a family business #notafamilybusiness
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