BMC की आड़ में परिवारवाद की ‘खिचड़ी’ कहाँ पकी?
Articlesमुंबई महानगरपालिका के चुनाव नज़दीक आते ही यह साफ़ दिखाई दे रहा है कि कोरोना काल में हुए खिचड़ी वितरण परियोजना में कथित भ्रष्टाचार का भूत अब भी उद्धव ठाकरे की पार्टी की गर्दन पर सवार है। आरोपपत्र में तो यही दिखाई देता है कि आम गरीब लोगों की थाली से खिचड़ी चुराने का पाप उद्धव बालासाहेब ठाकरे (उबाठा) गुट के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने किया। चुनाव आते ही उबाठा के नेता मराठी मानुस के हित की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन बीएमसी की भ्रष्ट व्यवस्था से त्रस्त मराठी मानुस की पीड़ा उन्हें दिखाई नहीं देती—यही सबसे बड़ी व्यथा है। मुंबई की सच्चाई यही है कि क्या उद्धव ठाकरे की पार्टी बीएमसी को “सोने के अंडे देने वाली मुर्गी” के रूप में तो नहीं देख रही—यह सवाल भी अब उठने लगा है। खैर, लेकिन गरीबों के मुँह का निवाला छीनने वाला वंशवादी नेतृत्व कभी भी मुंबई का भला नहीं कर सकता—यह उतना ही सत्य है। कोरोना काल में गरीब मज़दूरों की भूख इन्हें दिखाई नहीं दी, या फिर उबाठा के लोगों ने ही उनके मुँह से खिचड़ी का निवाला छीन लिया। बीएमसी की तिजोरी पर डाका डाला गया—और इसका हिसाब मुंबईकर इस बीएमसी चुनाव में ज़रूर माँगेंगे। जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे और महाविकास आघाड़ी सत्ता में थी, तब इस योजना की शुरुआत हुई थी। इसका उद्देश्य लॉकडाउन में फँसे प्रवासी मज़दूरों को मुफ्त भोजन उपलब्ध कराना था। लेकिन इसी मानवीय योजना में करोड़ों रुपये की “खिचड़ी” पकने का दावा किया गया और उसके राजनीतिक असर अब मातोश्री से लेकर मुंबई की गलियों तक दिखाई देने लगे हैं। कांग्रेस से निष्कासित होकर शिंदे गुट में शामिल हुए संजय निरुपम ने तो सीधे शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के शीर्ष नेतृत्व पर हमला बोला है। “सिर्फ़ अमोल कीर्तिकर ही नहीं, बल्कि संजय राऊत भी खिचड़ी चोर हैं,” ऐसा तीखा आरोप लगाते हुए निरुपम ने शिवसेना उबाठा में परिवारवाद की ओर उँगली उठाई। इतना ही नहीं, आदित्य ठाकरे के करीबी सूरज चव्हाण का नाम भी खिचड़ी चोरों की सूची में आरोपी के रूप में सामने आया है। तो अब सवाल यह है कि आखिर यह खिचड़ी घोटाला है क्या? खिचड़ी घोटाला आखिर है क्या? आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दाखिल आरोपपत्र के अनुसार, अप्रैल 2020 से जुलाई 2020 के बीच मुंबई महानगरपालिका ने खिचड़ी वितरण के लिए कुल 52 कंपनियों को ठेके दिए। उस दौरान चार करोड़ पैकेट वितरित किए जाने का दावा बीएमसी ने किया। प्रत्येक खिचड़ी पैकेट का वजन 300 ग्राम होना अनिवार्य था। लेकिन जाँच में सामने आया कि कई पैकेटों का वजन केवल 100 से 200 ग्राम था। बीएमसी ने प्रति पैकेट 33 रुपये का भुगतान किया, जबकि आरोपियों ने वही पैकेट 22–24 रुपये में तैयार करवाए। इससे कुल 14.57 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप आर्थिक अपराध शाखा ने अदालत में लगाए गए आरोपपत्र में दर्ज किया है। योग्यता न होने के बावजूद ठेके कैसे मिले? खिचड़ी वितरण के ठेके के लिए स्पष्ट शर्तें थीं— रसोईघर और स्वास्थ्य विभाग का लाइसेंस होना आवश्यक था, और प्रतिदिन कम से कम 5,000 पैकेट बनाने की क्षमता होनी चाहिए थी। लेकिन वैष्णवी किचन, सह्याद्री रिफ्रेशमेंट और फोर्स वन मल्टी सर्विसेस के पास न तो लाइसेंस था और न ही रसोईघर। फिर भी इन कंपनियों को ठेके दिए गए। जाँच में यह भी सामने आया कि फोर्स वन मल्टी सर्विसेस ने खुद खिचड़ी न बनाकर स्नेहा कैटरर्स को उप-ठेका दिया। यहीं से कम वजन वाले पैकेट बनाए गए। पूरी प्रक्रिया में फर्जी दस्तावेज़ तैयार किए गए, समझौते के बाद दस्तावेज़ों को बैकडेट किया गया और महानगरपालिका को धोखा दिया गया— ऐसा निष्कर्ष आर्थिक अपराध शाखा ने निकाला है। सूरज चव्हाण का नाम कैसे सामने आया? आदित्य ठाकरे के बेहद करीबी माने जाने वाले सूरज चव्हाण इस मामले में सबसे अधिक चर्चा में रहे हैं। आर्थिक अपराध शाखा और बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी उनके वित्तीय लेन-देन पर मुहर लगाई है। ईडी की जाँच के अनुसार, सूरज चव्हाण के निजी खाते में खिचड़ी ठेके से जुड़े 1.25 करोड़ रुपये जमा हुए। इसके अलावा, ठेकेदार कंपनी से उन्हें कुल 1.35 करोड़ रुपये “कंसल्टेंसी फीस” के रूप में दिए जाने का आरोप है। ईडी द्वारा प्राप्त चैट रिकॉर्ड के अनुसार, ठेकेदार कंपनी का मालिक चव्हाण को यह निर्देश देता पाया गया कि समझौते में कौन-सी तारीखें डालनी हैं और दस्तावेज़ कैसे तैयार करने हैं। अमोल कीर्तिकर भी घेरे में उत्तर मुंबई लोकसभा सीट से महाविकास आघाड़ी के उम्मीदवार अमोल कीर्तिकर, शिवसेना (उबाठा) के प्रमुख नेता हैं और ठाकरे परिवार के बेहद करीबी माने जाते हैं। वे पूर्व सांसद गजानन कीर्तिकर के पुत्र हैं। उन पर योग्यता न होने के बावजूद ठेका दिलाने और फर्जी दस्तावेज़ों के माध्यम से बीएमसी को धोखा देने का आरोप है। आर्थिक अपराध शाखा ने उनके सक्रिय सहभाग का दावा किया है। बीएमसी चुनावों की पृष्ठभूमि में यह मामला ठाकरे गुट के लिए गंभीर राजनीतिक संकट बन सकता है। सुजित पाटकर और संजय राऊत का कनेक्शन खिचड़ी घोटाले की राशि मुख्य आरोपी राजीव सालुंखे के खाते से संजय राऊत के करीबी सुजित पाटकर के खाते में जमा हुई। इसके बाद यही राशि संजय राऊत के भाई संदीप राऊत और उनकी बेटी विधिता राऊत के खातों में पहुँचने की जानकारी पुलिस जाँच में सामने आई है। “मुख्य सूत्रधार संजय राऊत” — संजय निरुपम का आरोप पत्रकार वार्ता में संजय निरुपम ने सीधे संजय राऊत को इस घोटाले का मास्टरमाइंड बताया। उन्होंने दावा किया कि सह्याद्री जलपान को मिले 6 करोड़ के ठेके में से 1 करोड़ रुपये राऊत के रिश्तेदारों को कमीशन के रूप में मिले। बीएमसी की भूमिका और ईओडब्ल्यू का निष्कर्ष बीएमसी ने कोरोना काल में प्रवासी मज़दूरों के लिए कम्युनिटी किचन योजना शुरू की थी। शास्त्रीनगर, महाराष्ट्रनगर, कांजूरमार्ग, कुर्ला जैसे इलाकों में लाखों लोगों को भोजन दिया गया। लेकिन शिकायतों के बाद हुई जाँच में भुगतान, ठेके की पात्रता, पैकेट का वजन और वास्तविक उत्पादन क्षमता—हर स्तर पर गड़बड़ियाँ पाई गईं। आर्थिक अपराध शाखा ने अदालत में यही निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। परिवारवाद का मुद्दा फिर सामने सूरज चव्हाण—आदित्य ठाकरे के बेहद करीबी अमोल कीर्तिकर—मातोश्री के निकट और ठाकरे परिवार के विश्वासपात्र सुजित पाटकर—संजय राऊत के खास इन नामों के कारण शिवसेना में परिवारवाद और “पारिवारिक साझेदारी” का मुद्दा फिर से चर्चा में है। चुनाव से पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों इसे आक्रामक रूप से उठा रहे हैं। संक्षेप में बीएमसी की खिचड़ी सिर्फ़ पतीले में नहीं, बल्कि परिवारवाद की राजनीति में भी पकती दिखी। गरीबों के लिए शुरू हुई कम्युनिटी किचन आज मुंबई की राजनीति का केंद्र बन गई है। लेकिन एक बात तय है— मुंबईकर अब और सहन नहीं करेंगे, क्योंकि बीएमसी किसी एक परिवार की जागीर नहीं है। BMC is not a family business #notafamilybusiness
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