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BMC का जम्बो कोविड सेंटर घोटाला: परिवारवाद की छत्रछाया में महामारी के दौरान भी तिजोरी पर डाका!

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मुंबई महानगरपालिका यानी BMC पर दो दशकों से अधिक समय तक ठाकरे परिवार का शासन रहा। इसी सत्ता-केंद्रित व्यवस्था की छत्रछाया में BMC में एक के बाद एक घोटालों के मामले सामने आते रहे हैं, और अब जांच एजेंसियों की पड़ताल से इसकी पुष्टि हो रही है। इन्हीं में से एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मामला है जम्बो कोविड सेंटर घोटाला। कोविड काल के दौरान जब मुंबई के मरीज ICU बेड और ऑक्सीजन के लिए तड़प रहे थे, उसी समय BMC की तिजोरी से करोड़ों रुपये के दुरुपयोग के आरोप इस मामले में लगाए गए हैं। इस घोटाले के मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने आया नाम है सुजित पाटकर, जो शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) के सांसद संजय राऊत के करीबी माने जाते हैं। इससे यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित न रहकर, यह सवाल भी खड़ा करता है कि किस प्रकार सत्ताधारी परिवार के नजदीकी लोगों को दिए गए ठेकों के माध्यम से BMC को एक तरह की “ATM” बना दिया गया। महामारी और जम्बो कोविड सेंटर की आवश्यकता वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी ने मुंबई को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था। सरकारी और निजी अस्पतालों में बेड उपलब्ध नहीं थे। इस पृष्ठभूमि में BMC ने दहिसर और वरली में बड़े पैमाने पर जम्बो कोविड सेंटर स्थापित करने का निर्णय लिया। उद्देश्य यह था कि इन केंद्रों के माध्यम से हजारों मरीजों को उपचार मिल सके। लेकिन इन केंद्रों का संचालन स्वयं BMC द्वारा न कर के, इसे Lifeline Hospital Management Services नामक एक निजी संस्था को सौंप दिया गया। उस समय राज्य में महाविकास आघाड़ी की सरकार थी, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे थे, और BMC पर शिवसेना का राजनीतिक प्रभुत्व था। ठेका वितरण पर सवाल जांच एजेंसियों के अनुसार, यह सवाल गंभीर रूप से उठता है कि Lifeline Hospital Management Services को ठेका देते समय उसकी योग्यता, उपलब्ध मानव संसाधन और अनुभव की उचित जांच की गई थी या नहीं। क्योंकि काम शुरू होने के बाद जो वास्तविक स्थिति सामने आई, वह ठेके की शर्तों के विपरीत थी। विशेष रूप से, कंपनी के प्रमुख सुजित पाटकर का सत्ताधारी दल के प्रभावशाली नेता संजय राऊत का करीबी होना, इस आशंका को जन्म देता है कि क्या ठेका देने में राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ। फर्जी रिकॉर्ड का चौंकाने वाला खुलासा प्रवर्तन निदेशालय (ED) और मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा की जांच में कई गंभीर तथ्य सामने आए। जम्बो कोविड सेंटर में आवश्यक संख्या में डॉक्टर, नर्स और चिकित्सा कर्मचारी वास्तव में कार्यरत नहीं थे, लेकिन कागज़ों में पूर्ण स्टाफ दिखाया गया। इतना ही नहीं, फर्जी उपस्थिति रजिस्टर तैयार किए गए और तथाकथित “घोस्ट कर्मचारियों” के नाम पर वेतन और सेवा शुल्क दर्शाया गया। जांच में यह भी सामने आया कि वरली जम्बो कोविड सेंटर के लिए कर्मचारियों की कोई भी ठोस जानकारी प्रस्तुत किए बिना ही BMC द्वारा बिलों को मंजूरी दे दी गई। अर्थात बिना वास्तविक निरीक्षण के, केवल कागजी दस्तावेज़ों के आधार पर करोड़ों रुपये का भुगतान कर दिया गया। 32 करोड़ रुपये का हिसाब और धन की हेराफेरी ED की जांच के अनुसार, सितंबर 2020 से जून 2022 के बीच Lifeline Hospital Management Services को BMC से लगभग ₹32.44 करोड़ की राशि प्राप्त हुई। यह धनराशि जम्बो कोविड सेंटर के प्रबंधन के लिए दी गई थी। लेकिन जांच में स्पष्ट हुआ कि इस धन का उपयोग निजी संपत्ति की खरीद, कर्ज चुकाने और रियल एस्टेट लेन-देन में किया गया। अर्थात कोविड मरीजों के उपचार के लिए आया पैसा, निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया—ऐसा आरोप जांच एजेंसियों ने लगाया है। BMC में जिम्मेदारी किसकी? इस घोटाले में केवल निजी कंपनी ही नहीं, बल्कि BMC के कुछ अधिकारी भी संदेह के घेरे में हैं। फर्जी दस्तावेज़, झूठी उपस्थिति और अधूरी सेवाओं के बावजूद बिल कैसे पास किए गए—यह एक गंभीर प्रश्न है। इस मामले में दहिसर जम्बो कोविड सेंटर के तत्कालीन डीन डॉ. किशोर बिसुरे को जुलाई 2023 में गिरफ्तार किया गया, जिन्हें फरवरी 2025 में जमानत मिली। BMC के कुछ अधिकारियों पर फर्जी रिकॉर्ड को मंजूरी देने के आरोप भी लगे हैं। मामले की शुरुआत मुंबई पुलिस में दर्ज FIR से हुई, जिसके बाद ED ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज कर जांच को और तेज़ कर दिया। यह घोटाला इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि ठाकरे परिवार के शासनकाल में BMC किस प्रकार एक “ATM” बन गई। कोविड काल में मुंबईकरों ने भयावह संकट झेला। अनेक लोगों ने अपने प्रियजनों को खो दिया। ऐसे समय में यदि स्वास्थ्य व्यवस्था का दुरुपयोग हुआ, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात है। यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और अंतिम निर्णय अदालत द्वारा दिया जाएगा। लेकिन इस घोटाले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि देश की सबसे समृद्ध महानगरपालिका परिवारवाद, राजनीतिक निकटता और ठेकेदारी संस्कृति के जाल में फँस जाए, तो उसकी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। आगामी BMC चुनावों की पृष्ठभूमि में, यह घोटाला केवल एक खबर नहीं, बल्कि मुंबई के प्रशासनिक भविष्य का सवाल बन गया है। इसने परिवारवादी भ्रष्ट मानसिकता को उजागर किया है। लेकिन मुंबईकर अब यह सब सहन नहीं करेंगे—क्योंकि याद रखिए, मुंबई किसी एक परिवार की जागीर नहीं है। BMC is not a family business #notafamilybusiness

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