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बीएमसी चुनाव : ठाकरे ‘कोलैब’ और जेन-ज़ी का ‘एग्ज़िट पोल’!
गोरगांव पत्रा चॉल घोटाले का माल किसने हड़पा?
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अस्तित्व की लड़ाई… तुम्हारी या मेरी?
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BMC का जम्बो कोविड सेंटर घोटाला: परिवारवाद की छत्रछाया में महामारी के दौरान भी तिजोरी पर डाका!
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रिश्ता वही, नीयत नई
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कैशिकोल : भ्रष्टाचार का अटूट जोड़!
घोटालेबाजों का फ्रेम गेम!
शहर मुंबईकरों का है, खानदानी जागीर नहीं!
मनमानी घर-घर की : बीएमसी फिल्म्स!
बीएमसी स्कूल चलें हम : नारे का दिखावा!
बीएमसी का भ्रष्ट दरबार!
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गोरगांव पत्रा चॉल घोटाले का माल किसने हड़पा?

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बीएमसी पर पिछले पूरे 25 वर्षों से एक ही राजनीतिक परिवार का दबदबा रहा है। इतने लंबे शासन में कई फैसले और परियोजनाएँ आईं, लेकिन कुछ योजनाएँ विकास की नहीं, घोटालों की पहचान बन गईं। इन्हीं में सबसे बड़ा और चर्चित नाम है— मुंबई के गोरगांव की पत्रा चॉल घोटाला। यह सिर्फ पैसों का मामला नहीं, गरीबों के हक़ पर सीधा डाका है। और इस घोटाले में जिनका नाम जुड़ा, वे हैं— मातोश्री के “राइट हैंड” और तेज़-तर्रार नेता संजय राऊत। पत्रा चॉल की शुरुआत: गरीबों का घर—एक सपना दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान गोरेगांव में करीब 50 एकड़ जमीन पर ब्रिटिश सेना के लिए अस्थायी बैरक बने। युद्ध के बाद वहीं 101 पत्रा चॉलों में 627 गरीब परिवार बस गए। इन्हें पक्के घर मिलें—इसी सोच से पुनर्विकास का प्रस्ताव आया। तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के दौर में योजना बनी: 808 घर बनाए जाएंगे। पहला झटका: गलत पुनर्विकास प्रोजेक्ट पहलेलोखंडवाला बिल्डर को मिला। करार था 375 वर्गफुट के घरों का, बने 322 वर्गफुट। विरोध भड़का और बिल्डर को बाहर कर दिया गया। म्हाडा की एंट्री और ‘गुरु आशीष कंस्ट्रक्शन’ 2007 में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने प्रोजेक्ट म्हाडा के जरिए पूरा कराने का फैसला किया। ठेका मिला प्रवीण राऊत की कंपनी गुरु आशीष कंस्ट्रक्शन को। शर्त साफ थी— 672 घर मुफ्त किरायेदारों को बाकी जमीन पर 3000 फ्लैटबिक्री के लिए लेकिन हकीकत इससे उलटी निकली। एचडीआईएल आई—और खेल पलट गया काम न कर पाने का बहाना बनाकर गुरु आशीष पीछे हटी। तब एचडीआईएल (राकेश वाधवान की कंपनी) ने एंट्री ली और गुरु आशीष को अपनी सब्सिडियरी बना लिया। 2010में प्रवीण राऊत ने कंपनी के 258% शेयर एचडीआईएल को बेच दिए। यहीं से आरोप है कि गरीबों का मकसद किनारे कर दिया गया। एफएसआई की बिक्री: ₹1034 करोड़ का खेल जांच में खुलासा हुआ— गरीबों के घरों के लिए तय जमीन का एफएसआई 8 निजी बिल्डरों को ₹1034 करोड़ में बेच दिया गया। किरायेदारों को घर नहीं मिले जमीन का व्यावसायिक दोहन हुआ पैसा निजी खातों में घूमता रहा और यह सब बीएमसी की सत्ता में बैठे एक परिवार के आशीर्वाद से—ऐसा आरोप है। प्रवीण–संजय राऊत कनेक्शन प्रवीण राऊत, संजय राऊत के करीबी और पारिवारिक मित्र बताए जाते हैं। ईडी की जांच में सामने आया— 2010में प्रवीण राऊत के खाते में ₹95 करोड़ जमा प्रवीण की पत्नी माधुरी राऊत ने संजय राऊत की पत्नीवर्षा राऊत को ₹55 लाख का ब्याज-मुक्त कर्ज दिया इसी पैसे से दादर में आलीशान फ्लैट और अलीबाग में जमीन खरीदी गई ईडी ने दोनों के बयान दर्ज किए और इन सौदों को घोटाले की रकम से जोड़ा। ईडी की कार्रवाई दादर का फ्लैट और अलीबाग की जमीन जब्त 2022में कई समन जांच में घोटाले की परतें खुलती गईं पत्रा चॉल घोटाला क्या सिखाता है? यह सिर्फ वित्तीय गड़बड़ी नहीं— पुनर्विकास के नाम पर गरीबों से धोखा सरकारी जमीन का निजी इस्तेमाल सत्ता के करीबियों को संरक्षण आख़िर सवाल यही है— क्या बीएमसी पर 25 साल की एक-परिवार की सत्ता, जनसेवा नहीं बल्कि सरकारी खजाने पर कब्ज़ा थी? अगर गरीबों के लिए बनी योजनाएँ कुछ लोगों की तिजोरी भरें, तो ये लोकतंत्र नहीं—लूटतंत्रहै। और इसलिए आज मुंबईकर साफ कह रहे हैं— बीएमसी किसी एक परिवार की जागीर नहीं है। BMC is not a family business #notafamilybusiness

गोरगांव पत्रा चॉल घोटाले का माल किसने हड़पा?

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हम दो, हमारे दो… परफेक्ट फैमिली!
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टांग टिंग टिंगाक… टांग टिंग टिंगाक… टांग टिंग टिंगाक… टूम…
टांग टिंग टिंगाक… टांग टिंग टिंगाक… टांग टिंग टिंगाक… टूम…
पहचान की बासी खिचड़ी का 'कॉम्बो मील…'
पहचान की बासी खिचड़ी का 'कॉम्बो मील…'
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BMC अग्निशमन दल में घोटाले और परिवारवादी सत्ता में शहर की सुरक्षा खतरे में!
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