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BMC के 12 हज़ार करोड़ के कामों पर CAG की चोट: एक परिवार की छत्रछाया में पनपा भ्रष्टाचार उजागर!

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मुंबई महानगरपालिका (BMC) को देश की सबसे समृद्ध स्थानीय स्वशासन संस्था के रूप में जाना जाता है। मुंबईकरों के करों से खड़ी हुई यह संस्था शहर के स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और विकास की रीढ़ है। लेकिन नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की विशेष ऑडिट रिपोर्ट ने बीएमसी के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस रिपोर्ट में लगभग 12 हजार करोड़ रुपये के कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितता, लापरवाही और पारदर्शिता की कमी उजागर हुई है। और क्या यह सब किसी के आशीर्वाद से हो रहा है? तो वर्षों से बीएमसी पर एक ही परिवार का शासन रहा है। इसी परिवार की छत्रछाया में घोटालों की एक श्रृंखला चलती रही। यह कहना गलत नहीं होगा कि बीएमसी की तिजोरी पर डाका डालने वालों को सत्ता में बैठे इस परिवार ने संरक्षण दिया। सवाल यह है कि पैसा कहाँ रिस रहा है—यह बात कॅग की रिपोर्ट से सामने आई है। बीएमसी के 12 हजार करोड़ रुपये के खर्च में अपारदर्शिता का ठपका कॅग ने लगाया है। 31 अक्टूबर 2022 को जारी इस विशेष ऑडिट में 28 नवंबर 2019 से 31 अक्टूबर 2022 की अवधि के कार्यों की जाँच की गई। विशेष बात यह है कि कोरोना काल के दौरान हुए कई खर्च इसमें शामिल न होने के बावजूद भी यह रिपोर्ट अत्यंत गंभीर है। कॅग के शब्दों में कहें तो यह रिपोर्ट केवल एक “ट्रेलर” है, और यदि पूरी जाँच हुई तो और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। कॅग की जाँच में यह पाया गया कि बीएमसी के दो विभागों ने बिना किसी निविदा प्रक्रिया के सीधे 20 कार्य सौंप दिए। करीब 214 करोड़ रुपये के ये कार्य सीधे आवंटित किए गए। इसके अलावा, 64 ठेकेदारों को बिना किसी औपचारिक अनुबंध के लगभग 4,755 करोड़ रुपये के कार्य दिए गए। अनुबंध न होने के कारण बीएमसी के पास इन ठेकेदारों पर कार्रवाई करने, कार्यान्वयन की जाँच करने या जवाबदेही तय करने का कोई अधिकार ही नहीं बचा—यह बात कॅग ने स्पष्ट की है। यह यहीं नहीं रुकता। तीन विभागों के 13 कार्यों में, जिनकी कुल कीमत 3,355 करोड़ रुपये से अधिक है, किसी भी थर्ड-पार्टी ऑडिटर की नियुक्ति नहीं की गई। परिणामस्वरूप, कार्यों की गुणवत्ता, वास्तविक क्रियान्वयन और खर्च पर कोई स्वतंत्र निगरानी नहीं थी। इसी पृष्ठभूमि में कॅग ने “पारदर्शिता की कमी, प्रणालीगत समस्या, ढीली योजना और निधियों का लापरवाही से उपयोग” जैसे कठोर शब्दों का प्रयोग किया है। दहिसर में भूमि खरीद का मामला तो बीएमसी की वित्तीय निर्णय-क्षमता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। 1993 की विकास योजना के अनुसार उद्यान, खेल मैदान और मातृत्व गृह के लिए आरक्षित 32 हजार वर्ग मीटर से अधिक भूमि को 2011 में अधिग्रहित करने का निर्णय लिया गया। लेकिन अंतिम खरीद मूल्य 349 करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो मूल अनुमान से 716 प्रतिशत अधिक है। भूमि पर अतिक्रमण होने के कारण पुनर्वास पर लगभग 78 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च अपेक्षित है। कॅग का निष्कर्ष स्पष्ट है—इस लेन-देन से बीएमसी को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं हुआ। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के SAP प्रोजेक्ट में भी गंभीर अनियमितताएँ सामने आईं। करीब 160 करोड़ रुपये का ठेका बिना निविदा मंगाए पुराने ठेकेदार को ही दे दिया गया। SAP India Ltd. को हर साल लगभग 37 करोड़ रुपये रखरखाव के लिए दिए गए, लेकिन इसके बदले कोई ठोस सेवा प्राप्त होने का प्रमाण नहीं मिला। चौंकाने वाली बात यह है कि इसी कंपनी को निविदा प्रक्रिया संभालने की जिम्मेदारी भी दी गई। 2019 की फॉरेंसिक ऑडिट में हेरफेर के गंभीर संकेत मिलने के बावजूद आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। पुल, सड़क और यातायात विभागों के कार्यों में भी नियमों की खुली अवहेलना दिखाई देती है। बिना स्वीकृति के अतिरिक्त कार्य दिए गए, ठेकेदारों को करोड़ों का लाभ मिला और अपेक्षित प्रगति न होने के बावजूद भुगतान किए गए। कई सड़कों के कार्य बिना किसी सर्वे के शुरू किए गए। कुछ स्थानों पर सामग्री का उपयोग किए बिना ही बिलिंग किए जाने की बात भी कॅग के संज्ञान में आई। संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के ट्विन टनल प्रोजेक्ट में वन विभाग की अंतिम अनुमति लिए बिना कार्य शुरू कर दिया गया। परिणामस्वरूप, कुछ ही वर्षों में इस परियोजना की लागत 4,500 करोड़ से बढ़कर 6,322 करोड़ रुपये हो गई। स्वास्थ्य विभाग में, KEM अस्पताल की इमारत बिना अनुमति के बनाए जाने के कारण जुर्माना भरना पड़ा। मिठी नदी प्रदूषण नियंत्रण परियोजना में चार अलग-अलग ठेकेदारों के नाम पर वास्तव में एक ही ठेकेदार को कार्य दिए जाने का खुलासा हुआ। मालाड पंपिंग स्टेशन का कार्य अयोग्य निविदाधारक को दिए जाने को लेकर कॅग ने सीधे तौर पर दुर्भावना की आशंका व्यक्त की है। विपक्ष का आरोप है कि ये सभी मामले केवल प्रशासनिक लापरवाही के उदाहरण नहीं हैं, बल्कि वर्षों से बीएमसी पर बनी राजनीतिक छत्रछाया के अंतर्गत विकसित हुई संस्कृति का प्रतिबिंब हैं। अधिकारी बदले, आयुक्त बदले, लेकिन सत्ता की डोर हमेशा एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही। उसी छाया में ये घोटाले पनपते गए—यह सवाल कॅग की रिपोर्ट के कारण एक बार फिर सामने आया है। क्या मुंबईकरों के कर का हर रुपया विकास पर खर्च हो रहा है, या कुछ चुनावी सुविधाओं के लिए—यह सवाल आज फिर पूछा जा रहा है। लेकिन इससे बीएमसी की सत्ता से घर चलाने वाले उस एक परिवार के भ्रष्ट शासन का पर्दाफाश हुआ है। और मुंबईकरों, बीएमसी का रहमान डकैत कौन है—यह आप ही पहचानिए। और आगे याद रखिए—बीएमसी किसी एक परिवार की जागीर नहीं है। BMC is not a family business #notafamilybusiness

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