टांग टिंग टिंगाक… टांग टिंग टिंगाक… टांग टिंग टिंगाक… टूम…
Articlesरंगराव पुरानी, समझदार पीढ़ी के एक बेहद सूक्ष्म दर्शक हैं। उन्होंने गिरगांव के थिएटरों में श्रीराम लागू की आवाज़ का रौब देखा है और काशीनाथ घाणेकर की सीटियाँ भी सुनी हैं। आज भी रंगराव सुबह उठते ही सामने लगे होर्डिंग को देखकर राजनीति को किसी नाटक की पटकथा की तरह परखते हैं। आज सामने वाले नाके पर दो भाइयों की ‘युति’ का पोस्टर लगा था, और रंगराव के होंठों पर अपने आप ही फ़िल्म नटसम्राट का एक संवाद आ गया— “एक अभिनेता के तौर पर तो तू घटिया है ही… लेकिन एक इंसान के तौर पर भी तू बेहद नीच निकला!” रंगराव को लगता है कि मुंबई महानगरपालिका का यह चुनाव कुछ पार्टियों के लिए एक पुराना, बार-बार पिट चुका नाटक नए नाम के साथ फिर से मंच पर लाने की बेताब कोशिश है। नटसम्राट में अप्पासाहेब बेलवलकर ने कहा था, “कोई घर देगा क्या, घर?” यहाँ दोनों भाई मुंबई की गलियों में घूम-घूमकर पूछ रहे हैं, “कोई सत्ता देगा क्या, सत्ता?” लेकिन रंगराव के मन में सवाल है— जिन लोगों ने अपने अहंकार की वजह से मुंबई के विकास को कभी ‘नटसम्राट’ बनने ही नहीं दिया, उन्हें फिर से एक बार “वन्स मोर” क्यों दिया जाए? उन्हें श्रीराम लागू का वह मशहूर कथन याद आ गया— “अब भगवान को रिटायर कर दो!” रंगराव मुस्कुराते हुए खुद से बुदबुदाए, “डॉक्टर साहब, भगवान के साथ-साथ अब इन ‘वारसदार’ ठाकरे भाइयों को भी राजनीतिक रिटायरमेंट देने का समय आ गया है!” पिछले कई वर्षों से इन दोनों भाइयों ने मुंबई महानगरपालिका को अपनी निजी ‘प्राइवेट विंग’ समझ रखा है। एक को ‘वीटो पावर’ चाहिए और दूसरा सिर्फ़ ‘प्रॉम्प्टिंग’ करना चाहता है। लेकिन इस पारिवारिक जुगलबंदी में मुंबई का विकास किसी फटे हुए परदे की तरह लटका हुआ है। इस नाटक का ‘प्लॉट’ देखिए—कितना दिलचस्प है! एक भाई का ‘इंजन’ भाप छोड़-छोड़कर थक चुका है और दूसरा अपना ‘धनुष्य-बाण’ संभाल नहीं पाया। अब समाधान क्या है? तो जवाब है— ‘मराठी अस्मिता’ का संगीत नाटक शुरू कर दो! यहाँ रंगराव को कट्यार काळजात घुसली का संवाद याद आता है— “संगीत साधना है, धंधा नहीं!” उसी तरह राजनीति भी जनसेवा का माध्यम होनी चाहिए थी, लेकिन इन दोनों भाइयों ने मिलकर उसे ‘फैमिली बिज़नेस’ बना दिया है। महानगरपालिका की तिजोरी उन्हें अपने खानदान का कोई ‘सम्मान पत्र’ लगती है, जो हर पाँच साल में उन्हीं को मिलना चाहिए। यह युति प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि “अपनी दुकान बचाने के लिए किया गया एक सुविधाजनक विलय” है। जैसे किसी गिरते हुए नाटक को भीड़ खींचने के लिए दो पुराने सुपरस्टार्स को साथ लाया जाता है, वैसे ही अब ये दोनों भाई गले में गले डालकर चिल्ला रहे हैं— “हम ही तुम्हारे तारणहार हैं!” अंत में रंगराव ने अपने चश्मे के काँच को साफ़ किया, आईने में खुद को देखा और बुदबुदाए— “यह राज्य तुम्हारा नहीं, यह राज्य जनता का है!” (यह संवाद उन्होंने किसी ऐतिहासिक नाटक में सुना था।) मुंबई इन दो भाइयों की ‘जागीर’ नहीं है कि वे बैठकर आपस में उसे बाँट लें। मुंबईकरों को अब ‘नेपोटिज़्म’ का यह उबाऊ नाटक नहीं चाहिए—उन्हें विकास का कोई ‘ब्लॉकबस्टर’ चाहिए। रंगराव दुकान से बाहर निकले और उस पोस्टर को देखकर ज़ोर से हँस पड़े। “अरे साहब, दर्शक अब समझदार हो गया है! आपकी यह ‘भाईचारा’ और सत्ता के लिए चल रही यह ‘ट्रैजेडी’ अब फ्लॉप होने वाली है। क्योंकि मुंबई को अब ‘अभिनेता’ नहीं, बल्कि सच में काम करने वाले ‘नायक’ चाहिए!” BMC is not a family business #notafamilybusiness
Continue watching