अस्तित्व की लड़ाई… तुम्हारी या मेरी?
Articlesसुबह सवा छह बजे अलार्म बजा… रम्या आधी नींद में आँखें मलता हुआ बाहर आया… ठंडा पानी मुँह पर पड़ा… टूथब्रश पर पेस्ट लगाई… दाँत घिसते-घिसते सोसायटी के कंपाउंड में टहलने लगा… ब्रश चल रहा था, दिमाग ऑफ था। तभी उसकी नज़र सोसायटी के गेट पर गई। लगा किसी ने नई फ़िल्म का पोस्टर चिपका दिया है। पास गया तो देखा—काले पोस्टर पर बड़े अक्षरों में लिखा था: “मराठी मानुष जागो… ये तुम्हारे अस्तित्व की आख़िरी लड़ाई है।” रम्या का ब्रश रुक गया। “क्या?” उसने आँखें मलकर देखा। अस्तित्व? मेरा? कल ही तो ऑफिस से मेल आया था—“Please be available on Sunday.” वो बुदबुदाया—मेरा रविवार वाला अस्तित्व तो कल ही खतरे में पड़ गया था… अब कौन-सी लड़ाई लड़नी है? अस्तित्व का यह ‘कन्फ्यूज़न’ लिए रम्या ने चारों ओर देखा। नल से पानी हमेशा की तरह कम दबाव में आ रहा था। सड़क के गड्ढे कल के ट्रैफिक से और गहरे हो गए थे। बेस्ट की बस रोज़ की तरह लेट थी—ये समस्याएँ ख़त्म होंगी, इसकी तो कोई उम्मीद ही नहीं। तो फिर यह आख़िरी लड़ाई किसके लिए? रम्या चिढ़ गया। ऐसे वक्त पर उसका दिमाग तेज़ चलने लगता है। आँखें सिकुड़ जाती हैं। उसकी आँखों के सामने एक दृश्य उभरा—दो राजमहल, और उन महलों से निकलती दो परछाइयाँ। वो लाइनें पंक्ति रम्या के लिए नहीं थी। वो तो उन दो परछाइयों की करुण पुकार थी। एक तरफ सत्ता से बाहर हुए ‘बड़े’, दूसरी तरफ चुनावी गणित में भटके ‘छोटे’। जब ये साथ आने के संकेत देते हैं, तो इसे ‘जनहित’ कहा जाए या ‘फैमिली बिज़नेस बचाने की जद्दोजहद’? कॉर्पोरेट दुनिया में घाटे में चल रही दो कंपनियाँ मिलती हैं तो उसे ‘मर्जर’ कहते हैं। यहाँ भी वही हो रहा है। पुराने झगड़े, पुरानी गालियाँ, पुराने आरोप—सब ‘रीसायकल बिन’ में डालकर एक नया सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किया जा रहा है, नाम है: “मराठी अस्मिता 2.0”। एक तरफ भाजपा-महायुति मुंबई 2.0, मुंबई 3.0 के ज़रिये शहर को तेज़ और गतिशील बनाने का सपना ज़मीन पर उतार रही है। और दूसरी तरफ… मराठी अस्मिता 2.0 के नाम पर पुराना माल नई पैकिंग में बेचने की बेबस कोशिश। रम्या को अपना अस्तित्व समझ आ गया। मराठी आदमी यहाँ मतदाता नहीं, साझेदार नहीं—वह बस “इमोशनल पावर बैंक” है। कॉर्पोरेट मर्जर में कर्मचारी नहीं, ब्रांड वैल्यू मायने रखती है—यहाँ भी वही। जब-जब सत्ता की बैटरी लो होती है, तब-तब इसी पावर बैंक से ‘अस्मिता’ का करंट खींच लिया जाता है। बैनर पर उसका नाम, भाषण में उसका ज़िक्र—लेकिन महानगरपालिका के बजट में उसका कोई पता नहीं। मुंबई महानगरपालिका एशिया की सबसे अमीर पालिका है। दशकों तक उसकी तिजोरी एक ही परिवार की चाबी से खुलती रही। अब जब चाबी खोने का डर लगता है, तो भाइयों को भाइयों की याद आने लगती है। यह विकास नहीं, यह जागीरदारी बचाने की सुविधाजनक जुगलबंदी है। उसके नाम पर बैनर, उसके नाम पर भाषण—और उसके असली सवालों पर हमेशा की तरह चुप्पी। रम्या सोचने लगा—अगर बैनर पर थोड़ा बदलाव हो जाए? अगर लिखा हो: “राज और उद्धव, जागो… ये तुम्हारे अस्तित्व की आख़िरी लड़ाई है।” तो कितना सटीक लगेगा! क्योंकि रम्या तो रोज़ लड़ता है—लोकल की भीड़ से, काम की डेडलाइनों से, और महीने के आख़िर में बढ़ते बिलों से। उस वक्त कोई भी उसे ‘अस्तित्व’ के नाम पर नहीं पुकारता। उसका अस्तित्व सिर्फ़ मतदान के दिन याद किया जाता है। BMC is not a family business #notafamilybusiness
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