कोहिनूर मिल: मराठी मज़दूरों की कब्रगाह पर खड़ा राजनीतिक–रियल एस्टेट साम्राज्य!
Articlesकोहिनूर मिल केवल एक औद्योगिक इकाई नहीं थी। वह हजारों मराठी मज़दूरों के श्रम, पहचान और पीढ़ियों की मेहनत की सजीव गवाही थी। इन्हीं मज़दूरों के पसीने से मुंबई खड़ी हुई। लेकिन जब मिल बंद हुई, तो सबसे पहले और पूरी तरह भुला दिए गए वही मज़दूर। इसके बाद जो हुआ, उसे ‘पुनर्विकास’ कहना शब्दों के साथ धोखा है—वह मज़दूरों के अधिकार निगलकर खड़ा किया गया एक भूमि सौदा था। मिल बंद हुई—क्या कानून भी बंद कर दिया गया? भारतीय श्रम कानून बिल्कुल स्पष्ट हैं। किसी मिल के बंद होने पर मज़दूरों को: • क्लोज़र मुआवज़ा • ग्रेच्युटी • भविष्य निधि (PF) • बकाया वेतन और बोनस समय पर और पूरी राशि में देना अनिवार्य है। लेकिन कोहिनूर मिल के मामले में सच्चाई यह रही कि: • कभी भी एकमुश्त, सामूहिक सेटलमेंट नहीं किया गया। • मज़दूरों को वर्षों तक श्रम न्यायालयों और सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाने पड़े। • असंख्य मराठी मज़दूर अपने वैधानिक अधिकार पाए बिना ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं थी—यह जानबूझकर की गई उपेक्षा की नीति थी। मज़दूरों का पैसा अटका रहा, लेकिन सौदे तेज़ी से चलते रहे यह सबसे बुनियादी सवाल है। जब मज़दूर अपने अधिकारों की माँग कर रहे थे, उसी समय: • कोहिनूर मिल की क़ीमती ज़मीन के सौदे आगे बढ़ते रहे। • कंपनियाँ बनाई गईं, साझेदारियाँ तय हुईं। • और अंततः उसी ज़मीन पर हज़ारों करोड़ का व्यावसायिक प्रोजेक्ट खड़ा हो गया। तो क्या यह महज़ संयोग था कि: • मज़दूरों की देनदारियाँ ‘विवादित’ घोषित कर दी गईं, • और राजनीतिक संबंधों वाले निवेशक पूरी तरह सुरक्षित रहे? राज ठाकरे और कोहिनूर सौदा : पीछा न छोड़ने वाले सवाल विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार: • कोहिनूर मिल की ज़मीन ख़रीद और शुरुआती कंपनी संरचना में राज ठाकरे से संबंधित कंपनियाँ या साझेदार शामिल थे। • बाद में हिस्सेदारी बेची गई, जिससे बड़ा आर्थिक लाभ हुआ। • इसी कारण जाँच एजेंसियों ने पूछताछ के लिए बुलाया। यहाँ मुद्दा किसी न्यायालयी फ़ैसले का नहीं है। मुद्दा यह है कि— जिस सौदे में एक ओर मराठी मज़दूर अपने अधिकारों के लिए तड़प रहा था, उसी सौदे से राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोग समय रहते बाहर निकलकर अपना मुनाफ़ा कैसे सुनिश्चित कर पाए? शिवसेना (UBT), मनोहर जोशी परिवार और सत्ता का संरक्षण कोहिनूर मिल प्रकरण में: • शिवसेना के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के पुत्रों का नाम प्रवर्तक/साझेदार के रूप में सामने आया। • जाँच एजेंसियों द्वारा उन्हें भी पूछताछ के लिए बुलाए जाने की खबरें आईं। तो सवाल स्वाभाविक है: • जब शिवसेना सत्ता और प्रभाव में थी, तब मराठी मज़दूरों की बकाया राशि को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई? • पुनर्विकास पर मज़दूर-हित की सख़्त शर्तें क्यों नहीं लगाई गईं? जिस पार्टी ने दशकों तक ‘मराठी माणूस’ का नारा दिया, उसी दौर में मराठी औद्योगिक मज़दूर सबसे अधिक असुरक्षित कैसे रह गया? MHADA घर : एक भ्रम, एक ढाल बार-बार यह तर्क दिया गया कि— “मज़दूरों को घर मिले।” यह आधा सच है—और आधा सच सबसे बड़ा झूठ होता है। वास्तव यह है कि: • सभी मज़दूरों को घर नहीं मिले। • जिन्हें मिले, वे दूर-दराज़ इलाक़ों में और भारी देरी से मिले। • और सबसे महत्वपूर्ण बात— घर, वेतन, ग्रेच्युटी और PF का विकल्प नहीं हो सकता। इस तर्क का उपयोग मज़दूरों को न्याय दिलाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें चुप कराने के लिए किया गया। मराठी मज़दूर की हार कैसे सुनिश्चित की गई? कोहिनूर मिल में मराठी मज़दूर की हार तीन स्तरों पर हुई: आर्थिक — बकाया राशि नहीं मिली। कानूनी — न्याय में देरी, अर्थात न्याय से वंचित करना। राजनीतिक — जिनसे संरक्षण की अपेक्षा थी, वही सौदों के साझेदार बने। यह केवल एक मिल की कहानी नहीं है; यह राजनीतिक पहचान के ज़रिये सत्ता हासिल करने और सत्ता के ज़रिये मज़दूरों को भुला देने की कहानी है। निष्कर्ष : यह विकास नहीं था—यह विस्थापन था! कोहिनूर मिल का तथाकथित ‘पुनर्विकास’: • मराठी मज़दूरों के लिए न्याय लेकर नहीं आया। • बल्कि उनकी मेहनत की ज़मीन पर राजनीतिक–रियल एस्टेट साम्राज्य खड़ा कर गया। यह लेख किसी को न्यायालयीन रूप से दोषी नहीं ठहराता। यह एक नैतिक अभियोगपत्र है। जब मराठी मज़दूरों के पसीने से बनी ज़मीन पर अरबों की संपत्ति खड़ी हो जाती है, और वही मज़दूर अपने वैध अधिकारों के लिए दर-दर भटकता है— तब सवाल सत्ता में बैठे लोगों से ही पूछे जाएंगे। कोहिनूर मिल में जीत हुई राजनीति की। हार हुई मराठी मज़दूर की। BMC is not a family business #notafamilybusiness
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