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मुंबई में मराठी स्कूलों के बंद होने का ज़िम्मेदार कौन?

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मराठी भाषा के संवर्धन के लिए सरकार विभिन्न नीतियाँ, कानून और आदेश जारी कर रही है, लेकिन मुंबई में मराठी माध्यम के स्कूलों की संख्या लगातार घटती दिखाई दे रही है। यह बात केवल चिंताजनक ही नहीं, बल्कि सरकार की भाषा-सम्बंधी नीतियों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने वाली भी है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के शिक्षा विभाग के आँकड़ों के अनुसार, 2014-15 शैक्षणिक वर्ष में 368 मराठी माध्यम के स्कूल थे। लेकिन 2023-24 में यह संख्या घटकर मात्र 262 रह गई है। यानी पिछले दस वर्षों में मुंबई में 100 से अधिक मराठी स्कूल बंद हो चुके हैं। इससे पहले 2010-11 में शहर में 413 मराठी स्कूल संचालित थे। यह गिरावट ऐसे समय में हो रही है जब राज्य सरकार मराठी भाषा को अनिवार्य करने के लिए आक्रामक कदम उठा रही है। सरकारी और अर्ध-सरकारी कार्यालयों में मराठी भाषा को अनिवार्य किया गया है। साथ ही 2020 में ‘मराठी भाषा अध्यापन व अध्ययन अनिवार्य कानून’ लागू किया गया। केंद्र सरकार की ओर से मराठी को ‘अभिजात भाषा’ का दर्जा मिला है और मराठी भाषा नीति को भी हाल ही में मंजूरी दी गई है। लेकिन, वास्तविक शिक्षा स्तर पर मराठी माध्यम के स्कूलों की उपेक्षा हुई है, इसका स्पष्ट चित्र दिखाई देता है। महानगरपालिका के अधिकारी अभिभावकों का रुझान अंग्रेज़ी माध्यम की ओर होने को कारण बता रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि अंग्रेज़ी स्कूलों में प्रवेश न मिलने पर मराठी माध्यम दूसरी पसंद बनता है। लेकिन शिक्षा विशेषज्ञ और मराठी भाषा के अध्येता इसका पूरी तरह विरोध करते हैं। उनके अनुसार, अभिभावकों की पसंद का संबंध गुणवत्ता से होता है, माध्यम से नहीं। यदि मराठी माध्यम के स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, आधुनिक सुविधाएँ, स्थिर प्रशासन और अच्छा शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराया जाए, तो अभिभावक निश्चित रूप से मराठी माध्यम की ओर मुड़ेंगे। दुर्भाग्यवश, कई मराठी स्कूलों में प्रधानाचार्य के पद खाली हैं, शिक्षक भर्ती रुकी हुई है और मूलभूत सुविधाएँ अपर्याप्त हैं। ऐसी स्थिति में स्कूलों की गुणवत्ता गिरती है और इसका असर विद्यार्थी संख्या पर पड़ता है। आगे चलकर प्रशासन ‘छात्र संख्या कम’ का कारण देकर स्कूल बंद करता है — और यही मराठी स्कूलों के पतन की श्रृंखला बन जाती है। मराठी स्कूल प्रबंधन संगठनों के प्रतिनिधि कहते हैं कि मराठी भाषा को अनिवार्य करने वाले कानून मौजूद होने के बावजूद, उनका क्रियान्वयन और पालन नहीं होता। भाषा का अभिमान केवल घोषणाओं तक सीमित रह जाता है, जबकि वास्तविकता में मराठी माध्यम के स्कूल बंद होते जा रहे हैं। कुछ अभिभावक संगठनों का कहना है कि आज भी कई अभिभावक अपने बच्चों को मराठी माध्यम में शिक्षा दिलाना चाहते हैं, लेकिन उनके इलाके में गुणवत्तापूर्ण मराठी स्कूल उपलब्ध ही नहीं हैं। स्कूल बंद होना मांग न होने का संकेत नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विफलता का लक्षण है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले कुछ वर्षों में मुंबई में मराठी माध्यम के स्कूल ही नहीं बचेंगे—ऐसी चेतावनी भी कई लोगों ने दी है। ऐसा हुआ तो मराठी भाषा केवल एक विषय के रूप में पढ़ाई जाएगी, लेकिन शिक्षा के माध्यम के रूप में उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। यदि मराठी भाषा को टिकाए रखना है, तो उसकी जड़—अर्थात मराठी माध्यम के स्कूलों—में निवेश करना होगा। केवल नियम, आदेश और भाषणों से अधिक, गुणवत्तापूर्ण मराठी स्कूल, सक्षम शिक्षक और भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था खड़ी करना ही सच्चे मराठी-प्रेम की कसौटी है। BMC is not a family business #notafamilybusiness

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