बीएमसी चुनाव : ठाकरे ‘कोलैब’ और जेन-ज़ी का ‘एग्ज़िट पोल’!
Articlesमुंबई के एक आलीशान कैफे में आर्यन और शनाया बैठे हैं। आर्यन के आईफोन पर “ब्रेकिंग न्यूज़” चमकती है… “मुंबई बचाने के लिए ठाकरे भाइयों का ‘महामर्जर’!” आर्यन: (आँखें फाड़कर) यो शनाया, ज़रा ये देख! क्या ठाकरे ब्रदर्स फिर से ‘पैच-अप मोड’ में आ गए हैं क्या? टीवी पर तो ऐसा माहौल है जैसे Splitsvilla का ग्रैंड फिनाले चल रहा हो! शनाया: (मोबाइल पर रील्स स्क्रॉल करते हुए) ओह प्लीज़ आर्यन! ये तो पूरी कार्दशियन फैमिली वाली फील दे रहा है। हर चुनाव में इनका नया सीज़न आ जाता है। इट इज़ सो ‘मीडियॉकर’ यार! सोच ज़रा, कल तक एक-दूसरे को ‘रोस्ट’ कर रहे थे और आज अचानक ‘ब्रो-कोड’ याद आ गया? आर्यन: नहीं यार, लेकिन इस बार मामला बीएमसी का है। यानी एशिया की सबसे बड़ी ‘पिगी बैंक’! दोनों मिलकर बोल रहे हैं कि ‘मराठी अस्मिता’ खतरे में है। ये तो किसी पुरानी फ्लॉप फिल्म का रीमेक निकालने जैसा लग रहा है, है ना? शनाया: आय गेस, अब इन ‘नेपो-बेबीज़’ को रिटायर करने का टाइम आ गया है। मुंबई को अब ‘वारिस’ नहीं, बल्कि ऐसा विज़नरी एग्ज़ीक्यूटर चाहिए जो सच में काम करे। ये दोनों ऐसे लगते हैं जैसे रिटायर्ड स्टार्स ने मिलकर कोई ‘फ्यूज़न’ फिल्म बनाई हो—स्वाद पुराना है, बस मार्केटिंग नई है। आर्यन: और वो ‘अस्तित्व की लड़ाई’ वाला बैनर देखा? पढ़कर ऐसा लगता है कि ये आम लोगों के लिए नहीं, बल्कि अपने ‘फैमिली बिज़नेस’ की वैल्यूएशन के लिए लड़ रहे हैं। इट इज़ सो ‘क्रिंज’ शनाया! क्या मुंबई इनकी प्राइवेट प्रॉपर्टी है कि आपस में बैठकर बांट लेंगे? शनाया: बिल्कुल! जैसे नाटक का पर्दा गिरने से पहले कलाकार ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हैं, वैसे ही ये चिल्ला रहे हैं। लेकिन थ्योरी सिंपल है—अस्तित्व इनका खतरे में है, हमारा नहीं। इन्हें बस वो ‘चाबी’ चाहिए जो बीएमसी की तिजोरी खोलती है। आर्यन: और इस ‘कोलैब’ में सिर्फ बड़े साहब ही नहीं, उनके ‘वारिस’ भी हैं—आदित्य और अमित! पूरा मामला ‘नेपो-बेबीज़’ की ए-लिस्ट फिल्म जैसा लग रहा है। दोनों तरफ फैमिली लेगेसी है, लेकिन ‘ओरिज़िनल कंटेंट’ गायब है। शनाया: ओह गॉड, आदित्य! हमेशा ‘क्लाइमेट चेंज’ और ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ की बात करता है, जैसे हम लंदन में रहते हों। लेकिन जब बारिश में मुंबई ‘सबमरीन’ बन जाती है, तब उसका विज़न कहां चला जाता है? इतने साल बीएमसी इनके पास थी, तब कौन-सी ठोस नीति बनाई? आर्यन: फैक्ट्स! और अमित ठाकरे? कहते हैं ‘युवाओं के मुद्दे’ सुलझाएंगे। लेकिन कौन-से मुद्दे? खुद का करियर इंजन अभी प्लेटफॉर्म पर ही खड़ा है, तो मुंबई का भविष्य पटरी पर कैसे लाएंगे? इन दोनों ‘नेपो-लीडर्स’ को देखकर लगता है कि ठोस विज़न नाम की चीज़ ही नहीं है—बस पिता की विरासत पर ‘सिमुलेशन गेम’ खेल रहे हैं। शनाया: बिल्कुल! क्या तुमने कभी मुंबई की किसी बड़ी समस्या पर इनका ठोस सॉल्यूशन देखा है? ट्रैफिक, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, हाउसिंग—सब पर बस ‘इमोशनल स्पीचेस’। इट इज़ सो ‘सरफेस-लेवल’। इंस्टाग्राम पर एस्थेटिक फोटो अच्छे लगते हैं, लेकिन ग्राउंड लेवल पर विज़न पूरी तरह ब्लर है। आर्यन: सही कहा! इन्हें लगता है बीएमसी की तिजोरी की चाबी मिलना ही ‘लेवल-अप’ है। लेकिन मुंबईकरों को अब ‘हेरिटेज’ की बातें नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट सिटी’ का असली काम चाहिए। इन्होंने अब तक सिर्फ ‘अड़चन की राजनीति’ की है—मेट्रो का विरोध, प्रोजेक्ट्स पर स्टे। क्या यही विज़न है? दूसरों के काम पर ब्रेक लगाना डेवलपमेंट नहीं होता। शनाया: टोटली ‘क्रिंज’! ये दोनों ऐसे स्टार्टअप फाउंडर्स हैं जिनके पास फंडिंग (पिता का नाम) तो भरपूर है, लेकिन प्रोडक्ट (विज़न) पूरी तरह फ्लॉप है। इन्हें लगता है मुंबई कोई प्ले-स्टेशन है, जहाँ रीस्टार्ट दबाया और सब पहले जैसा। लेकिन पब्लिक अब समझदार हो गई है। हमें ‘वारिस’ नहीं, बल्कि ‘ग्राउंड-ब्रेकर्स’ चाहिए जो गली-मोहल्ले की समस्याएँ जानते हों। आर्यन: ट्रुथ बॉम्ब! ये सिर्फ अपने ‘फैमिली बिज़नेस’ की वैल्यूएशन बढ़ाने के लिए साथ आए हैं। इस गठबंधन में ‘विकास’ का रोडमैप नहीं, बल्कि ‘जागीरदारी’ बचाने का ब्लूप्रिंट है। चल निकलते हैं, नहीं तो इनके विज़न की बातें सुनकर मेरा दिमाग ‘हैंग’ हो जाएगा! शनाया: क्रेज़ी! चलो, बिल भरते हैं। और हाँ—बिल ‘स्प्लिट’ करेंगे… इन ठाकरे जैसी ‘युति’ नहीं चाहिए… वरना खाना ये लोग खाएँगे और बिल मुंबईकर भरेगा… BMC is not a family business #notafamilybusiness
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